प्रकृति के संरक्षण और संवर्धन एवं पर्यावरण के संतुलन का महापर्व, मरका पंडुम चैतरई कार्यक्रम में पहुंचे सीएम विष्णुदेव साय ।

मरका पंडुम +इरूक +तुमीर+रेका+गोर्रा+कोहका+कोर्रयाया पंडुम
(आम,तेन्दू, चार आदि प्रकृति प्रदत्त फसलों का त्यौहार)
कांकेर / खिलेश्वर नेताम :- प्रकृति प्रदत्त फसलों के “आगमन” और उनके” सम्मान” के लिए आदिवासी और बानी बिरादरी समुदाय के विभिन्न पेन नार,जागा,गढ़ मण्डाओ में मरका पंडुम/चैतरई महापर्व जारी
मरका पंडुम केवल आम उत्सव नहीं है,यह सम्मान का भाव हैं, मौसमी परिवर्तन का घर है और सांस्कृतिक रूप में पारिस्थितिक चेतना है।आदिवासी और बानी बिरादरी समुदाय के लिए प्रकृति एक विचार नहीं बल्कि जीवन है इनके लिए पेड़, फल नदिया,जंगल और पहाड़ व्यापार की वस्तु नहीं बल्कि मित्र और जीविका हैं हर पेड़ पौधों का विशेष महत्व व जुड़ाव है, प्रत्येक फल की एक कहानी है और मरका पंडुम ऐसे कई त्यौहारों में से एक है जहाँ जंगल के फलों का जश्न मनाया जाता है उनका सम्मान किया जाता है।

एक नजर इन ज्ञान की ओर सतत प्रवाहित समुदाय के रूढ़ि परम्पराओं को देखकर गर्व की अनुभूति करें।
मानवता का लक्ष्य यह नहीं कि तकनीक के माध्यम से प्रकृति को कुचल कर सिर्फ मानवीय महत्वाकांक्षाओं को आकार दो..बल्कि मानवता का लक्ष्य हैं प्रकृति के साथ मानवीय गुणों का विकास…क्योंकि प्रकृति खुशहाल रहेगी तभी मानवता प्रफुल्लित रहेगी…इसी मुख्य संदेश को प्रसारित करता महान पर्व मरका पंडुम/चैतरई महापर्व।
जनजाति समुदायों के जीवन दर्शन वर्तमान अति उपभोगवाद जनित चिन्ताजनक परिस्थितियों से बाहर निकालने की एक “बेहतर उम्मीद” जगाती हैं।
जनजाति समुदायों में इन पारम्परिक प्रकृति संरक्षण पध्दति को व्यवस्थित रूप देने के लिए उनके पास कोयापुनेम के रूप में सरल प्रकृति दर्शन भी है।गोटूल जैसे एजुकेशन सिस्टम है,नार,जागा,गढ़,मण्डा जैसे व्यवस्थित लोकतान्त्रिक प्रशासनिक ढांचा व इनके आलेख में जनजातियों के इन्ही पंडुम (त्यौहार/उत्सव/पर्व)का अध्ययन कर आदिवासियों के जीवन में वैज्ञानिक सम्मत नेंग व्यवस्था व पर्यावरणीय समस्याओ को हल करने के तरीको को समझने का प्रयास करेंगे…
जनजाति समुदाय में पंडुम का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है।हम अब तक सामान्यत: पंडुम का अर्थ त्यौहारो/उत्सवो के रूप में ही समझ पाए है।जबकि आदिवासी समुदाय में पंडुम अपनें अंदर बहुत ही” विस्तृत व गहन अर्थ” छुपाए हुए है, दरअसल आदिवासी समुदाय के लिए उत्सव के अतिरिक्त पंडुम प्रकृति को अंनतकाल तक मानव समुदाय के लिए अनुकूल बनाए रखने का एक वैज्ञानिक प्रक्रम भी है।
इसे और अच्छे से देखने के लिए इसे गोंडी भाषा में शाब्दिक विश्लेषण करते है ।
पंडुम शब्द गोंडी लैंग पंडना शब्द से निर्मित है जिसका अर्थ होता है बनाना अर्थात प्रकृति सम्मत परम्पराओ को अपने आने वाली पीढ़ियो के लिए भी सुरक्षित बनाए रखना।
इसे और बेहतर ढंग से समझने के लिए हम उदाहरण स्वरूप किसी एक पंडुम जैसे मरका पंडुम (फलो का राजा आम के फल का त्यौहार)के नेग दस्तूरो को देख सकते है, जैसे कि हम जानते है कि आदिवासी और बानी बिरादरी समुदाय किसी भी प्रकृति प्रदत्त उपज को वह तब तक खाना शुरू नहीं करता। जब तक कि अपने पूर्णावस्था में नहीं आ जाता है ।इसी मूल भावना” की तरह ही मरका पंडुम में भी मरका अर्थात आम का फल में टाका (बीज कोष)पूर्ण विकसित हो जाते है अर्थात उस अवस्था के बाद आम का फल अपने आने वाली पीढ़ी हेतु पौध अंकुरण की क्षमता विकसित करने लायक हो जाता है । तब सर्वप्रथम इस अदभूत ज्ञान को बताने वाले पूर्वजो/पेन्क/देवी देवताओ/ बूढ़ालपेन/प्रकृतिपेन को आम के फल की सेवा अर्पित कर समुदाय के सभी लोग एक साथ आम फल का उपयोग करना शुरू कर देते है।
इसके पीछे वैज्ञानिक कारण यह होता है कि यदि हम छोटे -छोटे व अपरिपक्व अवस्था से ही फलो का उपभोग करना शुरू कर देते है तो जाहिर है आम के वृक्ष पर पके हुए आम के फल तैयार नहीं हो पाएंगे और यदि आम के फल पक नहीं पाएंगे तो उस आम के फल की अगली पीढ़ी के लिए नया पौधा तैयार नहीं हो पाएगा ,जिसके दुष्प्रभाव से आने वाले मानव समुदाय को भी इस अदभूत प्रजाति से वंचित होना पड़ेगा। और आगे चलकर इस सदृश्य से अनेक प्रजातियों ही इस पृथ्वी पर नष्ट होने ,इसके कारण पृथ्वी के जैव विविधता पर घातक प्रभाव पड़ने लगेगा। इसके साथ ही उस प्रजाति के सन्तुलन बिन्दु /सहजीविता पर टीके हजारो अन्य जीवो कि भी विलुप्ति की उल्टी गिनती शुरू हो जाएगी इसलिए इस गंभीर ईको सिस्टम से सम्बंधित पहलु पर गहरी समझ रखते हुए आदिवासी और बानी बिरादरी समुदायों ने हजारो सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी अपने पारम्परिक ज्ञान पैकेटस को सतत विकसित करते हुए आ रहे है।
जिसे कोयतोर समुदायसअपने गोंडी भाषा में पूनेम कहते है पूनेम शब्द दो गोंडी शब्द पून+नेम से बना है पुन अर्थात जानना/ज्ञान और नेम अर्थात की ओर अर्थात जानने की ओर ,ज्ञान की ओर सतत प्रवाहित” होने वाले समुदाय ,इसे आदिवासी समुदाय “कोया पुनेम कहना पसंद करते है ।इस प्रकार इस पुनेमी ज्ञान को वे पंडुमो मे व्यवहारिक अनुप्रयोगो व्दारा संयोजित संवर्धित व पल्लवित करते हुए पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित करते है जैसा कि हमने मरका पंडुम के उदाहरणों में हमनें देखा।
यहां आश्चर्य जनक पहलू और भी है कि इन पंडुमो के पूनेमी उद्देश्यो की सटीकता से समुदाय को परिपालन के लिए छोटे -छोटे बहुत ही सरल व मजेदार नेंग नियमों के व्दारा इसे व्यवाहारिक व अनुपाल्य बनाए रखते है।मरका पंडुम में ही एक कोको पंडिग पाटा या नियंत्रित उपभोग करने का संदेश फैलाता मुर्गा और बीज का गीत गोटूल लया- लयोर (युवक-युवती)व्दारा गाया जाता है।
इस गीत को तब तक गाया जाता है जब आम के फलो को अपने पूर्वजो /पेन्क/देवी देवताओ/बूढ़ालपेन/प्रकृतिपेन को अर्पित कर रहे होते है और जब सेवा अर्पण करके उपस्थित जन समुदाय के बीच प्रथम उपभोग हेतु फलो के टुकड़े वितरित कर रहे होते है ।
ठीक इसी वक्त इसगीत को प्रश्न -उत्तरीय शैली में गाया जाता है…इस गीत के संक्षिप्त अनुवादित अंश इस तरह है..
मरका पंडुम……कोको को ”
रेका पंडुम………कोको को”
इरूक पंडेम …..कोको को”
तुमीर काया…….कोको को”
कोहका काया…..कोको को”
गोर्रा पंडुम………..कोको को”
यह छोटा सा गीत पारिस्थितिक संतुलन, वन नवीनीकरण और प्राकृतिक संसाधनों की संरक्षण व संवर्धन के बारें बहुत गहरी जागरूकता दिखाता है।
इसमें एक कोई भी बड़ा गोटूल लयोर खड़ा होकर खुशी खुशी नारा लगाते हुए सभी से पूछता है कि अब हमने आम फल सहित अन्य मौसमी फलो चार, तेंदू आदि की सेवा कर उपभोग तो शुरू कर रहे है, लेकिन उसे कैसे और किस तरह से खाना चाहिए के भावों से जोर- जोर से ओजस्वी गीत के रूप में एक -एक लाईन गाया जाता है..जैसे वह पूछता है.. आम का फल.. सामने से आवाज आता है..कोको को”…..कोको को”…कोको को”…
जिसका “भावार्थ” है कि अब “हम कैसे आम के फल को खाए जिससे सामने वाले बच्चो से उत्तर आता है मुर्गे की तरह “अर्थात एक -एक करके याने थोड़ा -थोड़ा करके ।सीधे तौर पर कहे तो चूंकि आम का फल बच्चो में लालच उत्पन्न कर सकता है। उस लालच को नियंत्रित करना जितना जरूरी है उतना ही फल तोड़ना ताकि उस वृक्ष में अंतिम तक पेड़ में ही प्राकृतिक ढंग से फल पक कर नयें अंकुरण की सम्भावनाओ को बढ़ा सके।
इसको हम उदाहरण के तौर पर यह अनुभव कर सकते हैं कि शहरी क्षेत्रो में बिना उद्यानिकी विभाग के आम के पौधो को प्राकृतिक ढंग से अपने आप उगने की कल्पना नही कर सकते। जबकि हर आदिवासी क्षेत्रो में ऐसे भारी भरकम विभागो के बगैर भी घरो मे ऐसे पौधे प्राकृतिक ढंग से पल्लवित होते रहते है।इस तरह जनजाति समुदाय इन पारम्परिक ज्ञान को गोटूल में संग्रहित व परिभाषित कर कोयापुनेम के रूप में पंडुम के व्यवहारिक क्रियाओ के व्दारा इस पृथ्वी को मानव समुदाय के लिए अनंतकाल के लिए सुरक्षित बनाए रखने की कोशिश करते रहने वाला समुदाय है।जनजाति संस्कृति सरल ,सार्वभौमिक और पवित्र जीवन दर्शन है।इतना ही नही पंडुम के अंदर एक साथ कई मानवीय लक्ष्यों को वैज्ञानिक सम्मत ढंग से साधने की कोशिश छुपी होती है।उदाहरण स्वरूप इसी मरका पंडुम/आम त्यौहार में पुरखो को अर्पण या सेवा से पहले चूंकि फलो को खाने की मनाही होती है। जिससे छोटे बच्चे भी इन छोटे फलो को खाने से दूर रहते है ।जबकि जिन इलाको में इन नियमों का पालन नही करते है ।उन क्षेत्रो मे छोटे बच्चों के मुह में छाले व घाव आम के सीजन में बहुतायत में दिखाई देते है ।दरअसल छोटे फलो में निकलनें वाला घातक एसिड मुंह और छाले उत्पन्न कर देता है।जिससे भविष्य में गंभीर इन्फेक्शन का खतरा भी हो सकता है।लेकिन जनजाति समुदाय की इन पंडुमों में निहित पुनेमी ज्ञान परम्पराओ से वे अपने बच्चो को इन खतरो से बचाकर रखने में भी कामयाब हो जाते है।इस तरह के अदभूत तकनीक हम जनजाति समुदाय के हर पंडुम में देख सकते है।इस परंपरा में गहरी पारिस्थितिक बुध्दिमता भी निहित हैं सिर्फ पुरी तरह पके हुए फलों का सेवन करके और कच्चें फलों को अछूता छोड़कर यह समुदाय यह सुनिश्चित करते हैं कि बीजों को परिपक्व होनें और अंकुरित होनें का मौका मिले जिससे नए पौधे और पैदा हो,ऐसा करके प्रत्येक साल सदियों सें अपने जंगलों की रक्षा करते है और पुनर्जीवित करते है।पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी युवाओ को न सिर्फ प्रकृति के प्रति श्रध्दा सिखाती हैं ब्लकि इसके साथ सामंजस्य बिठाकर प्रकृति आधार श्रेष्ठ आदर्श जीवन मूल्यों के साथ जीना सिखाती है।
इसलिए रविन्द्र नाथ टैगोर जी नें शांति निकेतन के सभा को अपने संबोधन में कहा था कि,आदिवासी से बेहतर कोई”शिक्षक” इस दुनिया में नही सकता ।
प्रकृति के बाद अगर कोई “दूसरा शिक्षक” है तो वो सिर्फ और सिर्फ “आदिवासी “है।
क्योंकि आदिवासी और बानी बिरादरी समुदाय महान “प्रकृति के रक्षक” है ।आदिवासी संस्कृति में इस पृथ्वी पर जीवन के अनेक” संभावनाओ” को अनंतकाल तक बचाए रखने की व्यवस्था इनके “महान पंडुमों” में समाहित है।
विकेश कुमार हिचामी
प्रदेश संयोजक नीति एवं अनुसंधान विभाग अनुसूचित जनजाति मोर्चा ।





