Donald Trump ने एक बार फिर NATO को लेकर कड़ा बयान दिया है,
Donald Trump ने एक बार फिर NATO को लेकर कड़ा बयान दिया है,

Donald Trump ने एक बार फिर NATO को लेकर कड़ा बयान दिया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मच गई है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि जब अमेरिका को जरूरत थी तब नाटो साथ नहीं आया और भविष्य में भी इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती। ट्रंप ने अपने बयान में खास तौर पर ग्रीनलैंड का जिक्र करते हुए इसे “बर्फ का बड़ा टुकड़ा” बताया, जो खराब तरीके से संचालित हो रहा है। उनके इस बयान ने सहयोगी देशों के बीच असहजता बढ़ा दी है। यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने नाटो की आलोचना की हो, बल्कि वह लंबे समय से इस संगठन के प्रति असंतोष जताते रहे हैं। उनका मानना है कि अमेरिका पर नाटो का आर्थिक और सैन्य बोझ ज्यादा है। ट्रंप के बयान से यह भी संकेत मिलता है कि वह वैश्विक गठबंधनों को नए नजरिए से देख रहे हैं। इस टिप्पणी ने अमेरिका और यूरोपीय देशों के रिश्तों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे भविष्य में रणनीतिक बदलाव संभव हैं। कुल मिलाकर यह बयान वैश्विक कूटनीति में नई बहस को जन्म दे रहा है।
बंद कमरे में हुई अहम बैठक
ट्रंप ने नाटो महासचिव Mark Rutte के साथ बंद कमरे में एक महत्वपूर्ण बैठक की, जिसमें कई संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा हुई। इस बैठक के बाद ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी दोहराई, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि दोनों पक्षों के बीच मतभेद अब भी कायम हैं। बैठक के दौरान ईरान और वैश्विक ऊर्जा संकट जैसे मुद्दे भी प्रमुख रहे। बताया जा रहा है कि ट्रंप ने नाटो देशों से अधिक सहयोग और जिम्मेदारी की मांग की। हालांकि, बैठक के बाद व्हाइट हाउस की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक बयान नहीं दिया गया। इससे कूटनीतिक हलकों में कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। ट्रंप का सोशल मीडिया पर कैपिटल लेटर्स में लिखा गया संदेश उनकी नाराजगी को और अधिक स्पष्ट करता है। इस मुलाकात का उद्देश्य तनाव कम करना था, लेकिन बयानबाजी ने स्थिति को और जटिल बना दिया। यह बैठक भविष्य की नीतियों को प्रभावित कर सकती है। साथ ही, इससे यह भी साफ है कि अमेरिका-नाटो संबंध एक संवेदनशील दौर से गुजर रहे हैं।
ईरान संकट और सीजफायर का असर
Iran के साथ बढ़ते तनाव के बीच स्थिति और गंभीर हो गई थी, जब होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया गया था। इससे वैश्विक गैस और तेल की कीमतों में भारी उछाल आया, जिसने दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया। इस संकट के बीच अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के युद्धविराम पर सहमति बनी, जिससे कुछ राहत मिली। हालांकि, इस सीजफायर से पहले ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी दी थी और बड़े हमलों की बात कही थी। उन्होंने यहां तक कहा कि जरूरत पड़ी तो ईरान के महत्वपूर्ण ढांचे को निशाना बनाया जाएगा। इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चिंतित कर दिया था। युद्धविराम के बाद भी तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल अस्थायी समाधान है। इस पूरे घटनाक्रम ने नाटो की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। ट्रंप की शिकायत है कि इस संकट में नाटो ने अमेरिका का अपेक्षित समर्थन नहीं किया।
नाटो से बाहर निकलने का कानूनी पहलू
पूर्व राष्ट्रपति Joe Biden के कार्यकाल में 2023 में एक महत्वपूर्ण कानून पारित किया गया था, जो किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति को नाटो से बाहर निकलने से पहले कांग्रेस की मंजूरी लेने के लिए बाध्य करता है। यह कानून ट्रंप जैसे नेताओं की संभावित एकतरफा कार्रवाई को रोकने के लिए लाया गया था। ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में दावा किया था कि उनके पास अकेले ही नाटो से बाहर निकलने का अधिकार है। नाटो की स्थापना 1949 में सोवियत संघ के खतरे के खिलाफ की गई थी और इसका मुख्य उद्देश्य सामूहिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इस संगठन के 32 सदस्य देश हैं, जो एक-दूसरे की रक्षा का वादा करते हैं। इस समझौते को केवल एक बार 2001 के 9/11 हमलों के बाद लागू किया गया था। इसके बावजूद ट्रंप का मानना है कि नाटो अमेरिका के लिए पर्याप्त योगदान नहीं देता। यह कानूनी बाध्यता फिलहाल अमेरिका के नाटो से बाहर निकलने की संभावना को सीमित करती है। लेकिन राजनीतिक परिस्थितियां बदलने पर यह मुद्दा फिर उठ सकता है।
ग्रीनलैंड विवाद और भविष्य की दिशा
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की टिप्पणी ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है, क्योंकि यह डेनमार्क का अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है और नाटो का हिस्सा भी है। ट्रंप पहले भी ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण की इच्छा जता चुके हैं, हालांकि बाद में उन्होंने अपने रुख में नरमी दिखाई थी। इस मुद्दे ने नाटो सहयोगियों के बीच मतभेद को और उजागर किया है। साथ ही, अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भी नाटो महासचिव के साथ अलग बैठक कर कई वैश्विक मुद्दों पर चर्चा की। इनमें ईरान संकट, रूस-यूक्रेन युद्ध और नाटो सहयोगियों के बीच जिम्मेदारी साझा करने जैसे विषय शामिल थे। यह स्पष्ट है कि आने वाले समय में अमेरिका और नाटो के रिश्ते और अधिक जटिल हो सकते हैं। ट्रंप का रुख इन संबंधों को नई दिशा दे सकता है। हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका वास्तव में नाटो से बाहर निकलेगा या नहीं। लेकिन इतना तय है कि यह मुद्दा वैश्विक राजनीति में केंद्र में बना रहेगा।





