25 साल बाद लौटी परंपरा और खुशहाली, नक्सल मुक्त सुकमा में गूंजा आस्था का स्वर ।
सिंगाराम में कोराज देव व काटरा कन्नम्मा देवी का भव्य जात्रा ।

सुकमा / मोहित सागर:- वर्षों तक नक्सल आतंक की छाया में दबी आस्था और परंपरा आखिरकार एक बार फिर पूरे उल्लास के साथ जीवंत हो उठी। ग्राम पंचायत सिंगाराम के वंजलवाया-वायदोडडी में लगभग 25 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद कोराज देव और काटरा कन्नम्मा देवी जी का भव्य जात्रा निकाला गया। यह ऐतिहासिक आयोजन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा, बल्कि सुकमा जिले के बदलते हालात और शांति की वापसी का प्रतीक भी बना।
इस जात्रा में भेज्जी परगना के विभिन्न देवी-देवताओं को आमंत्रित कर पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना की गई। ढोल-नगाड़ों, पारंपरिक वाद्य यंत्रों और जनजातीय नृत्य-गीतों के बीच निकली इस शोभायात्रा ने पूरे क्षेत्र को भक्तिमय बना दिया। गांव के बुजुर्गों से लेकर युवा और महिलाएं तक बड़ी संख्या में शामिल हुए, जिससे यह आयोजन एक विशाल जनसमूह का उत्सव बन गया।

ग्रामीणों के अनुसार, बीते कई दशकों से नक्सल गतिविधियों के कारण इस प्रकार के धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन संभव नहीं हो पा रहे थे। लोगों के मन में डर और असुरक्षा का माहौल था, जिसके चलते पारंपरिक जात्रा बंद हो गया था। लेकिन अब सुकमा के नक्सल मुक्त होने के बाद पहली बार इस स्तर पर जात्रा का आयोजन किया गया, जिससे लोगों के चेहरे पर खुशी और संतोष साफ दिखाई दिया। यह आयोजन केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक बनकर उभरा है। जात्रा के दौरान ग्रामीणों ने एकजुट होकर यह संदेश दिया कि अब वे भय के साये से बाहर निकलकर अपने रीति-रिवाजों और परंपराओं को पूरी श्रद्धा के साथ आगे बढ़ाएंगे।
इस ऐतिहासिक आयोजन में ग्राम पंचायत सिंगाराम की सरपंच दयावती मड़कम और उनके पति मड़कम मुद्राज (सब-इंस्पेक्टर, छत्तीसगढ़ पुलिस) की महत्वपूर्ण भूमिका रही। दोनों के सहयोग से यह आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
जात्रा के दौरान पूरे गांव में उत्सव का माहौल देखने को मिला। मेहमानों का स्वागत किया गया और बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी ने इस ऐतिहासिक पल का आनंद लिया।
यह जात्रा सुकमा जिले में शांति, सुरक्षा और विश्वास की वापसी का प्रतीक बन गया है। लंबे समय बाद आयोजित इस भव्य आयोजन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब सुकमा न केवल नक्सल मुक्त हो रहा है, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर भी मजबूती से लौट रहा है।





