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*ईरान की सत्ता में IRGC का बढ़ता प्रभाव, कूटनीति और सैन्य फैसलों पर पकड़ मजबूत*

*ईरान की सत्ता में IRGC का बढ़ता प्रभाव, कूटनीति और सैन्य फैसलों पर पकड़ मजबूत*

*ईरान की सत्ता में IRGC का बढ़ता प्रभाव, कूटनीति और सैन्य फैसलों पर पकड़ मजबूत*

ईरान की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स का प्रभाव तेजी से बढ़ता बताया जा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अब देश के अहम सैन्य और कूटनीतिक फैसलों में IRGC की भूमिका निर्णायक होती जा रही है। द न्यूयॉर्क पोस्ट की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि हाल के दिनों में यह बदलाव और स्पष्ट रूप से सामने आया है। कहा जा रहा है कि IRGC से जुड़े नेताओं, खासकर अहमद वाहिदी और उनके करीबी सहयोगियों ने सत्ता के प्रमुख निर्णयों पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में तनाव बढ़ रहा है और अमेरिका के साथ बातचीत भी कमजोर पड़ती नजर आ रही है। इस स्थिति ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता बढ़ा दी है।

रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि ईरान के पारंपरिक नेतृत्व ढांचे में बदलाव करते हुए कई उदारवादी नेताओं को किनारे कर दिया गया है। इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ वॉर के अनुसार, विदेश मंत्री अब्बास अराघची जैसे नेताओं की भूमिका सीमित कर दी गई है। बताया जा रहा है कि उन्होंने अमेरिका के साथ बातचीत के बाद होर्मुज़ जलडमरूमध्य को खोलने का संकेत दिया था, लेकिन IRGC ने इस फैसले को पलट दिया। संगठन का मानना है कि अमेरिकी दबाव का जवाब सख्ती से दिया जाना चाहिए और इसी कारण इस अहम समुद्री मार्ग को बंद रखने की रणनीति पर जोर दिया गया। इससे यह साफ संकेत मिलता है कि अब विदेश नीति जैसे महत्वपूर्ण मामलों में भी IRGC का हस्तक्षेप बढ़ गया है। इस बदलाव ने ईरान की नीति दिशा को अधिक कठोर बना दिया है।

सैन्य और रणनीतिक मोर्चे पर भी IRGC की पकड़ मजबूत होती दिखाई दे रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, अहमद वाहिदी को मोहम्मद बाघर ज़ोलघाद्र का समर्थन मिला है, जो सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव हैं। इससे देश की सुरक्षा और सैन्य अभियानों पर IRGC का प्रभाव और बढ़ गया है। इसके अलावा, हाल के संघर्षों में पारंपरिक नौसेना को हुए नुकसान के बाद IRGC अब तेज़ गति वाले हमलावर जहाज़ों पर ज्यादा निर्भर हो रहा है। फ़ारसी खाड़ी में उसकी गतिविधियां बढ़ने से क्षेत्रीय तनाव भी बढ़ गया है। इस बदलाव को ईरान की सैन्य रणनीति में एक बड़े परिवर्तन के रूप में देखा जा रहा है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि देश अब अधिक आक्रामक रुख अपना सकता है।

कूटनीतिक स्तर पर भी इस बदलाव के गहरे असर देखने को मिल रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, वार्ता टीम के भीतर मतभेद उभरकर सामने आए हैं और IRGC समर्थित नेताओं का दबदबा बढ़ गया है। मुज्तबा खामेनेई का प्रभाव भी इस पूरी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बताया जा रहा है कि वार्ता टीम को तेहरान वापस बुला लिया गया, जिससे बातचीत की संभावनाएं और कमजोर हो गई हैं। इस बीच क्षेत्र में तनाव तब और बढ़ गया जब ईरान ने समुद्री मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर कार्रवाई शुरू कर दी। इससे कई देशों के जहाज प्रभावित हुए और हालात और जटिल हो गए। विश्लेषकों का मानना है कि इस सत्ता परिवर्तन से पश्चिमी देशों के साथ संबंध और खराब हो सकते हैं। ऐसे में आने वाले समय में इस क्षेत्र में अस्थिरता और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

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खिलेश्वर नेताम

मैं खिलेेश्वर नेताम, *Talk India Digital* का मुख्य संपादक हूं। पत्रकारिता मेरे लिए सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदारी और सेवा का माध्यम है। वर्षों से मैं निष्पक्ष, सत्य और जनहितकारी पत्रकारिता के सिद्धांतों पर काम करता आ रहा हूं।

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